एक लता और दरख़्त ...
चारों ओर से
ऊंचे ऊंचे दरख़्तों से
घिरी थी नन्हीं सी
एक लता
वो लता चाहती थी बढ़ना
उठना चाहती थी
और ऊपर
और ऊंचा
देखना चाहती थी
वो सूरज को करीब से
छूना चाहती थी आसमान को
चाहती थी हवाओं के साथ झूमना
और पंछियों की चोंच को चूमना
इसलिए पकड़कर जकड़कर
दरख़्त के तने को
वो लता
खड़ी होने लगी
बड़ी होने लगी
धीरे धीरे
लिपटकर तने से
ऐसे जुड़ गई वो
उस दरख़्त से
कि भूल गई
अपनी सारी पहचान
उसके आलिंगन में
खो दी उसने अपनी सुध बुध सब
उसे नहीं चाह थी बढ़ने की अब
उसे तो बस चाह थी अब
'अपने' दरख़्त के साथ की
नहीं चाहत रही उसे अब
उन पंछियों की
उन हवाओं की
उस अजनबी आसमां की
और उस सूरज की ...
:- भुवन पांडे
#बढ़ना