अब तो आइने से भी
नफरत सी हो रही हैं,
जब भी देखता हूं खुदको
मेरी आँखों मे आज भी
तूम ही क्यों नजर आते हो.
जब खेलना ही था मेरे दिलसे तो केह देते,
सीना चिरकर दिल कदमो में रख देते,
दिल लगाकर हमसे ,
किसी और की बाहों में
जाने की जरूरत क्या थी.
देखकर आइनेमें खुदकी आँखे
यही सवाल दर्देदिल से उठते हैं..!
"के अपनि ही मस्तमलंग भरी
जिंदगी जी रहे थे हम योगी,
ये आबाद दुनियाँ उजाड़ कर
बाउम्र भर तड़प की सजा
देने की आखिर वजह क्या होगी....!"