सब ख़त्म होने को है , ,
शुरुआत से शुरू होने को है
अंत फिर से आदि होने को है
अब कोई जात नही पात नही
सब इंसान साथ होने को है , ,
अब मंदिरों में अज़ान सुनाई दे
या मस्जिदों में राम नाम जपना
हर कोई सब कुछ खोने को है
बंजर जमीन बीज बोने को है , ,
सब अंत होने को है , ,
न सुनाई देती है अब नारेबाजी
न सड़को पे दंगे लड़ाई होती है
मज़हब का धंधा ठप्प होने को है
इंसान शायद इंसान होने को है , ,
सांसें सारी ही छूट जाने को है
अब सोचता हूं पुकार लू तुमको
क़यामत के रोज़ मिलना था हमे
सो लो अब क़यामत होने को है , ,
सब ख़त्म होने को है ।