प्रियतम मधुशाला गए चालिस दिन के बाद ।
माताजी मत कीजिए इस क्षण कुछ प्रतिवाद ।।
दिवस निशा की अधीरता नहिं मुख से कहि जाय ।
बिरही मन को आज फिर प्राण प्रिय मिली आय ।।
पंक्ति बद्ध ऐसे खड़े मधुशाला के पास ।
जैसे प्रभु की कृपा हित भक्त करै अरदास ।।
सामाजिक दूरी खड़ी मंद -मंद मुस्काय ।
मदिर मनुज मानत नहीं एकै ढ़िंग झुंड़ियाय ।।