नाप ली पूरी धरा जो वेदना की
न दिखी किरणे ,अंधेरा है अभी
मूल्य है जो ये !(दुःख)तुम्हारा
क्या हुआ चुकता नही |
कर दिया तुमको समर्पित ,
न पता क्या था मेरा|
मुझको तो तुमने ही, गढ़ा,
जानो तुम्ही! मुझे क्या है पता?
दौड़ती ही रह गई मै, जिन्दगी भर|
जीत न जानी न जानी हार पर,
दौड़ने का अब न करता मन मेरा,
भाग कर जाऊँगी ,आखिर मैं कहाँ|
प्राण मे है ,प्राण की लगती कमी,
शून्यता की खोज मे ,है शून्यता की ही
कमी|