“लोग”
गले लगाकर गला काटते हैं लोग,
दुआएँ भी अब फायदा देख कर बाँटते हैं लोग…
रोने वालों को यहाँ रुलाया जाता है,
और हँसने वालों को खुशियाँ बाँटते हैं लोग…
फकीरों के लिए कौड़ी भी नहीं बची,
रईसों को तोहफे बाँटते हैं लोग…
गिराकर दूसरों को खुद बढ़ने के लिए,
मंदिरों में मन्नतें माँगते हैं लोग…
सच्चाई का दिखाना यहाँ जुर्म बन गया है,
झूठ बोल कर इज्जत कमाते हैं लोग…
अपना मतलब निकल जाए जहाँ से,
वही रिश्ते पल में भूल जाते हैं लोग…
प्राची गुर्जर….