#आनंद *रोज-रोज 'भजन-सिमरन' करने से, धीरे-धीरे हमारे अंदर इतनी 'सहनशीलता' आ जाती है, कि हम बिना संतुलन खोए, जीवन में आने वाले 'उतार-चढ़ाव' का सामना करने लगते हैं।*
*हमें इस बात का 'ज्ञान' होने लगता है, कि जो कुछ भी हो रहा है, वह हमारे 'कर्मों' के अनुसार ही हो रहा है, और 'सतगुरु' हमेशा हमारे अंग-संग हैं।*
इसके बाद जो आंनद की अनुभूति होती है वह परम आनंद होता है
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