रणचंडी
सलोनी आजकल नव्या को कहीं भी अकेले भेजने में डरने लगी थी। आए दिन बढ़ती किडनैपिंग और रेप की खबरें उसे डराती रहती थी।
कल शाम उसकी सहेली निवेदिता ने कहा, "पहले का दिन ही अच्छा था, औरत को कितना सम्मान दिया जाता था।" उसकी बात सुनकर सलोनी को अपनी दादी की बात याद आ गयी। वे अक्सर अपनी बहुओं को ताने मारकर अपने समय की कहानियाँ सुनाया करती थी, "तुम लोगों को क्या है, बस खाना बनाओ और खिलाओ। हमारे समय में चक्की, मुसल सब चलाना पड़ता था और औरतें घर में ही रहा करती थी।" एक - दो बार बोलते-बोलते उन्होंने ये भी बताया कि पहले कैसे किसी विधवा औरत के साथ घर के ही मर्द अपनी शारीरिक भूख मिटाया करते थे। किसी का पति अगर बच्चे पैदा करने में अक्षम होता था तो घर के ही किसी अन्य सदस्य के संसर्ग से बच्चे जना जाता है और उस नामर्द की कमी छिपा ली जाती थी। ये कमी अगर किसी बहू मे होती थी तो पति की दूसरी शादी करा दी जाती थी। यानि स्त्रियों का सफर कभी सुरक्षित नहीं रहा, कभी घर वालों से दमित रही तो कभी बाहर वालों ने शोषण किया।
विचारों के इसी झंझावातों में सलोनी फंसी थी कि उसकी मेड शांता बेन आ गयी। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी स्कूल के तरफ से दो दिनों के लिए पिकनिक पर सापूतारा गयी है। उसने पूछ लिया, "तेरह साल की बच्ची को अकेले भेजने में डर नहीं लगता आपको?"
शांता बेन हंसते हुए बोली, "हम लोग आप लोगों की तरह बेटी को डरपोक नहीं बनाते, किसी ने गलती से छूने की हिम्मत भी कर ली न तो सीधे उसके अंग काट लेगी। उसे तेज धार की चाकू देकर रखी है।
सलोनी विस्फारित नेत्रों से शांता बेन को देखकर सोचने लगी, " आत्मरक्षा का ये भी एक बढ़िया उपाय है, इस मानसिक कोढ़ का कुछ न कुछ उपाय तो करना ही पड़ेगा। आज लड़कियों को सीता नहीं रणचंडी बनकर बाहर निकलने की जरूरत है"।