हे जननी हे पुण्य धरा हे मातृभूमि हे कर्मभूमि
अर्पित है मेरा ये जीवन सादर तेरे ही चरणों में
है ऋणी तेरा सारा जीवन जो देने का उपकार किया
मिटकर तेरा ये कर्ज कभी लौटा तो नहीं सकता ऐ मां
सेवा का भाव मिटे न कभी ये कृपा सदा करना ऐ मां
तेरे चरणों की धूलों से है उज्ज्वल ये सारा जीवन
नहीं लगने दूंगा दाग़ कोई रहे उज्ज्वल सदा तेरा दामन
दुश्मन चाहे जैसा भी हो दूं मिला राख में ये वर दे
बलि बलि जाऊं इस माटी पर मन भरे नहीं ऐसा वर दे
इस पावन माटी का तिलक लगा हो जाऊं धन्य हे वीर धरा
समृद्ध इतिहास की थाती का गुण गाऊं और इठलाऊं मैं
हे वीर प्रसूता, मातृभूमि चाहत ये सदा पूरी करना
हो पुनर्जन्म इस माटी में चाहूं मै सदा तुम पर मरना
#जन्म