खुल गया गगन ये
खुल गयी धरा भी,
मनुष्य जो अजन्मा
वह भी खिल गया।
हर क्षण लड़ रहा
अनन्त सब रच रहा,
सूर्य का मोल नहीं
प्रकाश का तोल नहीं।
चल पड़े विजय पर
हार भी उधर है,
जन्म तो ले लिया
मृत्यु भी यहीं है।
इक आवाज बहुत है
जब सुनी गयी ध्यान से,
एक शब्द भी बहुत है
यदि जपा गया ज्ञान से।
भय भी बना हुआ
युद्ध भी सजा हुआ,
सुख-दुख अजन्मा
वह भी मिल गया।
**महेश रौतेला