बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो......
मेरे अंदर का बचपन एक कौने में सिसकता हुआ मिला
सपने जो संजो के रखे थे वो दम तोड़े हुए मिले
यादों की पोटली जगह-जगह से फ़टी हुई मिली
नज़्में जो कभी रह गयीं थी अधूरी, अधूरी ही मिलीं!
बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो......
कुछ हिसाबों की पर्चियां मिली जिनकी स्याही फैल चुकी थी...
कहीं पर ज़िन्दगी आधी-अधूरी पड़ी हुई थी
सोच की सृजनता अपना वजूद खोई हुई मिली
शब्द अपना प्रवाह भूले इधर-उधर पड़े थे
कुछ रिश्ते मिले जो अब शायद कागज़ी हो चुके हैं
बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो......
लड़कपन के कुछ कारनामे अब भी वहीं रखे हुए थे
किताब में सूखा फूल अब भी उसकी खुश्बू लिए हुए था
उसके होने का एहसास आज भी मौजूद मिला
वो मुस्कराहट आज भी मिली उसी आईने में जिसे छुपा दिया था मैंने कपड़ों के पीछे!
बरसों बाद आज अलमारी को खोला तो......
part I...
© रविश 'रवि'