बुजदिल नहिं मैं।
अपनी हुकूमत से लाचार हुँ।
एक इशारे की राह तक रहे है।
फिर मेरी गोली उनके औऱ उनके आका के छाती फाड के पार होगी।
ना मैं डरता हुँ ईन नामर्द हिज़डो से।
मुझे तो यही मिटना है मातृभूमि की गोद मे।
जिगरा रखता हुँ , १०० पर भारी हुँ।
मेरा जुनून ही मेरा कवच हैं।
बस कुछ ख्वाहिश बाकी है।
अब तो तिरंगे मे लिपटना बाकी है।
कश्मीर मेरी सान्से है।
औऱ तुम्हारे लिए खट्टे अंगूर।
छोड़ दो ए जिद़ अब ओर खेरात ना बाटेंगें।
है सून मेरी जन्म औऱ करम वाली दोनों माँ।
अब तो उस खैराती मुल्क का पुनः जन्म न हो पाए वैसी बदतर मौत देनी है।
वीजभगत