#शून्य
मैं और शून्य हास्य व्यंग
-----------------
आर्यभट्ट के बाद शून्य को प्रोमोट और चरितार्थ करने में मेरा महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।
जानकारी के लिए बता दूं मेरा नाम फूल चंद है और मैं अपने आप को पी .सी.ही कहलाना पसंद करता हूं ।
कक्षा आठ तक तो मैं नंबर वन स्टूडेंट रहा था ।
उसका श्रेय मेरे उन ट्यूशन पढ़ाने वाले टीचर्स को जाता है जो क्लास में शिक्षक थे और मुझे घर पर ट्यूशन देने आते थे । अत्यंत ईमानदार और पवित्र गुरूजन सदैव नियत समय पर आकर मेरे घर पर प्रतिदिन नियत समय पर
चाय और कभी कभी नाश्ता भी ग्रहण करते थे ।
पढ़ाई की औपचारिकताएं और मेरे कान वान खींच दिया करते थे ।
मां कहती-"गुरु जी आपने पढ़ाया तो है ही नही"
" बहन जी आपका बच्चा बहुत होशियार है
इशारे में समझ जाता है और फिर हम है न "
मां बच्चे की प्रशंशा सुनकर गद्गदायमान हो जाती और
मार्कस भी 70 % प्रतिशत से ऊपर ही होते थे ।
नवमीं कक्षा के बाद मेरा परिचय शून्य से हुआ ।जब
पांच विषय में से तीन विषय में मुझे शून्य अंक प्राप्त हुए।
इन दिनों मुझे जबरन नालेज हुआ कि शून्य का आविष्कार
आर्य भट्ट ने किया था ।(शायद मैं उसका ब्रांड एम्बेसडर
होने वाला था) खैर एनी हाऊ नवमी तो मैंने लांघ ली।
परंतु 10thबोर्ड थी फस्ट क्वाटरली में हिंदी छोड़ सारे
विषय में शून्य दर्शन हुए ।
पिता जी ने जमके कूटा और शेखी बघारी-' जानते हो
मैंने दसवें में टाप किया था मेथ्स में डिस्टेंक्शन था '
मगर मां पापा की दीवाली की सफाई में मिली मार्क सीट दिखाते हुए गुब्बारे में सुई टोंच दी ।
"ज्यादा मत फेंको ग्रेस मार्क से पास हुए हो । वो तो काका
(मेरे पापा के बड़े भाई विधायक प्रतिनिधि है उन्हे सब काका कहते हैं) जी की मेहरबानी है जो तुम नगर निगम में बड़े बाबू हो "
पापा जी ने अपनी दुम समेटी(फाईलें) और आफिस
खिसक लिए ।
मां ने समझाया 'बेटा पढ़ ले कम से कम 0के आगे 4तो लगा (40नं.) किसी तरहा से आगे बड़ नहीं तो ना नौकरी मिलेगी न तेरी शादी होगी ।
नौकरी तो ठीक है छोकरी का प्रलोभन बड़ा था।
इसलिए मैंने मेहनत की और शून्य से आगे निकल गया ।