My Painful Poem...!!!
यारों भ्रम तूटें है सारे इन्सान है केद में
अमीरों-गरीब भी है तो अलग-अलग
मरीज़ों-सेहतमंद भी है अलग खानें में
मानो जहाँ बना आज एक अलमारी-सा
राहों-फ़िज़ा-ओ-गिज़ा सब कुछ है तो
दुश्वार पर बंदे बँटे है हरे-लाल खानें में
आज भी अपनी हरकतों से बाज़ नहीं है
बजाय गिड़गिड़ानेके बंदे लगे मनमानी में
देखता तो है वह अनदेखी ऑंखो से हमें
पर हम नासमझ-से मानते नहीं इशारे में
देता आज भी वह है ढील समझाने को
इन्सानों को नाज़ुक हालत में वक़्त में
बस प्रभु की कृपा-द्रष्टि बची नसीब में
ऑंखें मुन्तज़िर है प्रभु के रहमोकरम में
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