मिले थे पिछली दफा जब हम - तुम
हमारी आखिरी वो मुलाक़ात
अंगारों सी दहकती तेरी आँखें
अब भी जेहन में तरोताजा है
तुमने कहा था
मर चुके तुम मेरे लिए
मर चुका मेरा हृदय-स्पंदन तुम्हारे लिए
नहीं जानती वो सब सच था
या मुझे जीने का बहाना देने की
एक कोशिश मात्र थी तुम्हारी
भावनाएँ कभी मरती नहीं
लाख सितम करे जमाना
संवेदनाएँ कभी दबती नहीं
बदलती है बस अपना रूप
दिल में सदा रहता है प्रेम का सैलाब
रूपान्तरित होकर किसी न किसी रूप में
मौजूद होता है हमारे अंदर
कभी क्रोध बनकर
तो कभी नफरत के रूप में..
प्रेम सदा सजीव रहता है..!!
#मुलाक़ात