बहुत हो चुका, अब ऊसर में
हमको करनी काश्त नहीं।
अब लोहू से सना तिरंगा
है हमको बर्दाश्त नहीं।।
प्रायश्चित करना होगा अब
हमें अनकिये पापों का!
अब विषदंत तोड़ना होगा
आस्तीन के सांपों का!!
बारूदों की गंध उगाती
अब केसर की क्यारी है।
और खून से उसे सींचना
भारत की लाचारी है??
वह मुसलमान जो भारत में,
रह कर रहीम-रसखान बने।
जो बने वीर अब्दुल हमीद,
और भारत माँ की शान बने।।
जिसको हिन्दू का राम-कृष्ण,
शंकर और दुर्गा प्यारा है।
वह नहीं मुसलमां, हिन्दू है!
वह तो मन प्राण हमारा है।।
जिसको जन-गण-मन, वंदे-मातरं
से कोई परहेज नहीं।
उसको अपना कहने से
हमको भी कोई गुरेज नहीं।।
पर देख जले जो हिन्दू को!
वह बला टालनी ही होगी!!
गन्दी नजरों वाली आँखें,
जबरन निकालनी ही होंगी!!
प्रवचन कायरता-पूर्ण,
"शान्ति रक्खो!" भ्रामक उपदेशों को!
तलवारों पर जंग लगाते
गौतम के उपदेशों को!!
स्वाभिमान के पत्थर से
तुम खुरच-खुरच कर दूर करो!
अपनों को पहचानो! अरि-दल
के घमण्ड को चूर करो!!
प्रेमगीत लिखते-लिखते
यह स्याही जो रो देती है।
समय पड़े तो वह स्याही
चिनगारी भी बो देती है।।
जागो कलम-पुरोधा जागो!
मौसम का मजमून लिखो!!
राष्ट्र-धर्म के श्लोकों को ही
संसद का कानून लिखो!!
गद्दारों के लंबे-लंबे
खून सने नाखून लिखो!
उनकी छाती पर अब केवल
धुँआ-धमाका-खून लिखो!!
*मैं सीधे शब्दों में तुमको*
*सत्य बताने आया हूँ!*
*जागो! जागो! राष्ट्र-धर्म की*
*अलख जगाने आया हूँ!!*
#आजाद