आदमी और संत
नर्मदा नदी के तट पर एक महात्मा जी रहते थे। उनके एक शिष्य ने उनसे निवेदन किया कि मुझे आपकी सेवा करते हुये दस वर्षों से भी अधिक समय हो गया है और आपके द्वारा दी हुई शिक्षा भी अब पूर्णता की ओर है। मैं भी अब संत होना चाहता हूँ और आपके आशीर्वाद की अपेक्षा रखता हूँ।
महात्मा जी ने मुस्कुराकर कहा - पहले इंसान बनने का गुण समझो फिर संत बनने की अपेक्षा करना।
इंसान का गुण है कि धर्म, कर्म, दान के प्रति मन में श्रद्धा का भाव रखे। उसके हृदय में परोपकार एवं सेवा के प्रति समर्पण रहे। ऐसे सद्पुरूष की वाणी मे मिठास एवं सत्य वचन के प्रति समर्पण हो। उसका चिंतन सकारात्मक एवं सदैव आशावादी रहे। वह जुआ, सट्टा व परस्त्रीगमन से सदैव दूर रहते हुये अपने पूज्यों के प्रति आदर का भाव रखता हो। ऐसा चरित्रवान व्यक्ति क्रोध, लोभ एवं पापकर्मों से दूर रहे। जीवन में विद्या ग्रहण एवं पुण्य लाभ की हृदय से अभिलाषा रखे एवं अपने गुणों पर कभी अभिमान न रखे। इन गुणों से मानव इंसान कहलाता है।
संत बनने के लिये पुण्य की भावना, पतित-पावन की सेवा, उनकी मुक्ति की कामना जीवन का आधार रहे। मन में सद्विचार पर्वत के समान ऊँचे एवं सागर की गहराई के समान गंभीर हों। वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता बनने की क्षमता रखे तथा आत्मा को ही अपना सर्वोत्तम साथी रखे। उसके कर्मों का फल उसकी आत्मा को पाप और पुण्य का अहसास कराने की शक्ति उत्पन्न कर दे। सत्य से बड़ा धर्म नही, झूठ से बड़ा पाप नहीं, इसको वह जीवन का सूत्र बना ले। आत्म बोध सदा उपकारी मित्र होता है, इसे अंतर आत्मा में आत्मसात् करे। वह कामना ही मन में संकल्प को जन्म देती है और लोकसेवा से ही जीवन सार्थक होता है, इसे वास्तविक अर्थों में अपने जीवन में अंगीकार करें। इतने गुणों से प्राप्त सुकीर्ति संत की पदवी देती है।
मैंने तुम्हें इंसान और संत बनने की बातें बता दी हैं। अब तुम अपनी राह अपने मनन और चिंतन से स्वयं चुनो। यह कहकर महात्मा जी नर्मदा में स्नान करने हेतु चले गये। इतना सुनने के बाद वह शिष्य पुनः महात्मा जी की सेवा में लग गया।