सुदंर रचना ,तृष्णा ....
तृष्णा का इतिहास निराला ,तृष्णा सब को बहुत ललचाती हैं ।
एक तृष्णा पुरी हो तो ,दुसरी तैयार हो जाती हैं ।।
तृष्णा को आज तक कोई भी जीत न पाया हैं ।
तृष्णा के ही बल पर बडे बडो ने मुंह की खायी हैं ।।
तृष्णा क्यूं पुरी नहीं होती ,ये राज समझ में नहीं आया हैं ।
किसी को धन की तृष्णा ,किसी को पद की तृष्णा ।।
किसी को वैभव की तृष्णा ,किसी को अभिमान की तृष्णा ।
सब को तृष्णा ने धूल चटाई है ,पर कोई उसे छोड न पाया हैं ।।
धरती पर जितने भी प्राणी ,सभी तृष्णा के भुखे हैं ।
तृष्णा की लालच में वो अपराधी बन जाते हैं ।।
अपना यश ,प्रसिद्धि गंवा कर जैल चले जाते हैं ।
तृष्णा की लालच छोडो ,कर्म से नाता जोड लो ।।
कर्म से ही भाग्य बदलता ,सब कुछ पल में पा जाता हैं ।
तृष्णा के भरोसे रहते वो सदा दुःख पाते है ।।
मृग मरीचा सी तृष्णा के आगे औधे मुंह धूल चाटते हैं ।
तृष्णा का इतिहास निराला ,तृष्णा सबको ललचाती हैं ।।
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