My New Poem ...!!!!
जैसा हुनर बंदे तुम ज़बानको शीखाऔगें
वैसा ही मतँबा जहाँ में तुम भी पाओगे
यह दुनियावाले हिसाब के है बड़े पकके
कभी किसी ख़ता को हरगिज़ न बख़्शते
रुपये-पैसे की गिनतीं में तो गर हो जाएँ
गलती तो शायद दर-गुजर कर भी देंगे
पर आन-बान-शान-औ-अहंकार को
जो छु जाएँ वो गलती कभी न बख्शते
दंभ मर्यादा ख़ानदानी जूठी रस्मों रिवायत
के नाम पर तो ख़र्चेगें लाखों-हज़ारों नगद
पर वक़्त आने पे सगे माँ-बापको न बख्शते
तसल्ली के नाम पर गर साथ रखें भी तो
बूढ़े ज़हन पे तानों की बौछार ही बरसातें
उफ़ गलतीं से बहश बीबी से हो जाएँ तो
गहरे रिश्ते पानी मोलभाव, वृद्धाश्रम पहुँचाते
आजकल हर तीसरे चौथे घर की है कहानी
घर तो बना महलों-सा पर बुझुँगोसे ख़ाली
प्रभु सुबुद्धियों की कोई दिशा इन्हें दिखाएँ
रब करे कोई नई सुबह नया-सा पैग़ाम लाएँ
जो दादा-पौत्र नाती-नवासीको क़रीब लाएँ
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