एहसास
उस सूखते पेड़ को देखा
भावुक हुआ मन
और
सोचने लगा दिमाग
बोल उठा वह शिकायती लहजे में
कि
टुकड़ों में बंटा हुआ मेरा वजूद
जिसने जब जैसा चाहा
इस्तेमाल किया मुझे
मेरी चाहतों को दरकिनार कर
अपने अपने हिस्से की
थोड़ी सी छाया
थोड़ा सा सुकून
थोड़े से फल
थोड़ी सी जरूरत
सब कुछ माँगा मुझसे
मैंने बाखुशी दिया
अब मेरी बारी है
मुझे भी चाहिए
सिर्फ थोड़ा सा प्यार
थोड़ी सी देखभाल
मेरे लिए नहीं
मेंरे अस्तित्व के लिए
क्योंकि
मेरे बिना खतरे में है
तुम्हारा भी अस्तित्व..
सोचते सोचते यकायक
तलब उठी चाय की
और मेरे बिना कहे ही
हमेशा की तरह
नमूदार हो गयी मेरी पत्नी
चाय का कप हाथ में लेकर
और मैं
चाय के घूँट के साथ
उतारता रहा कुछ भीतर
घूँट घूँट जीती जिंदगी
सरकती रही सामने
और फिर..
पत्नी और पेड़
घुलमिल गए
एक दूसरे में...!!
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक
(16/11/2018)