विश्वास
देखा है मैंने
काली खौफनाक
परछाइयों को
रेंगते हुए पैरों तले
डरी नहीं मैं..
जानती थी
नज़दीक ही कहीं
उजाला है...
देखा है मैंने
कोने में गुमसुम
बैठे उस एक
विचार को जमते हुए
ठिठकी नहीं मैं..
जानती थी
बहने वाला सृजन का
लावा है...
देखा है मैंने
उस मासूम भोले
बचपन को
वक़्त से लड़ते हुए..
रुकी नहीं मैं
जानती थी
उसका भी एक दिन
वक़्त बदलने वाला है...
देखा है मैंने
पेड़ की शाखों पर
लटकते फूल और
पत्तों को मुरझाते हुए
थमी नहीं मैं..
जानती थी
पतझर के बाद
बसन्त आने वाला है...
देखा है मैंने
सड़क के किनारे
दुबके हुए उस
जीवन को ठहरते हुए
सिहर गयी मैं..
जानती थी
कोई मसीहा उद्धार के लिए
नहीं आने वाला है...!
©डॉ वन्दना गुप्ता
मौलिक