हर्फ एक भी, ना निकले, मौन का पैरहन जिंदगी,
मिजाज ए महोबत ,बाध ली है। , सरहदों में दिल;
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समय का खेल निराला, होता है, यकीनन,
अपना भी कोई, पराया हो जाता है क्यू?
दर्द ए ग़म एहसास, जगाते हुए जिंदगीमें,
ज़ख्म की विरासत देकर, चला जाता क्यू?
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