अतीत में लौटे।मुमकिन है किकुछ भाग्यशाली लोगों के जीवन में यह अतीत वर्तमान में भी मौजूद हो।यह तब की बात है, जब घर में बनने वाली पहली रोटियां गोमाता ,कुत्ते और अतिथि के लिए निकाली जाती थी।उसके बाद परिजनों और अंत में स्वंय के लिए।प्रथम पाठशाला कहे जाने वाले परिवार का यह महत्वपूर्ण पाठ हुआ करता था और उसकी गुरु होती थी परिवार की बुज़ुर्ग महिला सदस्य जैसे दादी बड़ी माँ या माँ या परिवार की कोई महिला।
यह है देने का भाव।इस भाव के विकास के सामाजिक ही नहीं ,मनोवैज्ञानिक पहलू भी है।यहाँएक दिलचस्प तथ्य पर गौर करें ।आमतौर पर यह धारणा होती है कि जब व्यक्ति आध्यात्मिक होता है तो उसमें प्रेम, समर्पण, करुणा और देने का भाव विकसित होने लगता है।जबकि असल में होता यह है कि जब ये गुण व्यक्ति में विकसित होने लगते है तो आध्यात्मिक होने लगता है । तब ही वह सही मायने में मनुष्य कहलाने का अधिकारी होता है।दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक गुरु इस बात पर एकमत हैकि"देने" कायह भाव ,प्रेम का प्रारंभिक व अनिवार्य लक्षण है।