#गांधी गीरी
शिक्षक को मन से पढ़ाने का मौका मिल जाए तो वह कोयले की खान से कोहिनूर हीरा निकाल सकता है।उसके हाथ में देश का भविष्य है। लेकिन क्या भविष्य निर्माण करने वाले को बार बार रोकना, उसकी पसंद के विषयों से विपरीत जानबूझकर पढ़ाने के लिए मजबूर करना यह बड़े साहब की आदत होती गई। एक बार बताया कि यह उसका पसंदीदा विषय है तो उसे नहीं दिया गया, विधार्थियों को नये प्रोग्राम के लिए प्रेरित किया तो बताया कि वो इनलिगल काम करते हैं। संस्था में उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए पत्र लिखा। खुद नया कुछ करना नहीं चाहते और दूसरे के अच्छे काम किए जाने पर भी परेशान करते रहना उसकी आदत होती गई।शायद उसको दूसरे के साथ बूरा करने के बाद ही सुकून मिलता हो? साहित्य के क्षेत्र में ऐसे साहब ने बदनाम करने की कोशिश की है। लेकिन अब शिक्षक ने भी संतुष्टी से ही काम चलाना सीख लिया उसके विचार से लगता है कि वह सब कुछ बदल देगा यह वैसा ही वहम है बैल के नीचे चला जा रहा कुत्ता खुद को समझने लगता है कि गाड़ी में ही चला रहा हूं। अब साहब को इंतजार है कि मैं विद्रोह करुंगा लेकिन गांधी जी के दूसरे गाल आगे करने वाली स्थिति में अब बेचारे की हालत गंभीर बनी हुई है।
यह सत्य है इर्ष्या में लोग क्या कर जातें हैं खुद को भी नहीं पता। शिक्षक का काम है आगे बढ़ते हुए निरंतर विधार्थियों के हित में लगे रहते भविष्य की चिंता किए जाना।