स्वतंत्रता अमूल्य है
देश भी अमूल्य है,
मानवता अमूल्य है
सब साथ-साथ चले चलें।
जीव-जन्तु क्षुब्ध हैं
पेड़-पौधे निस्तेज हैं,
स्वतंत्रता वहाँ भी
कंटकों से घिरी है।
जनता इधर क्षुब्ध है
भाषाएं निस्तेज हैं,
स्वतंत्रता वहाँ भी
कंटकों से घिरी है।
अनन्त स्वर सृष्टि के
योग में, सुयोग में,
स्वतंत्रता सभी की
मरे नहीं, चले सदा।
**महेश रौतेला