आत्मसम्मान
” मैंने चोरी नही की है, मुझे आपकी चूड़ियों के विषय में कोई जानकारी नही है। मुझे पुलिस के हवाले मत कीजिए, वे लोग मुझे बहुत मारेंगे, मैं चोर नही हूँ, गरीबी की परिस्थितयों के कारण आप के यहाँ नौकरी कर रहा हूँ। ऐसा अन्याय, माँ जी मेरे साथ मत कीजिए। मेरे माता-पिता को पता होगा तो वे बहुत दुखी होंगे। “ मानिक नाम का पंद्रह वर्षीय बालक रो-रो कर, एक माँ जी को अपनी सफाई दे रहा था। वह घर का सबसे वफादार एवं विश्वसनीय नौकर था।
माँ जी की सोने की चूड़ियाँ नही मिल रही थी। घर के नौकरों से पूछताछ के बाद भी जब कोई समाधान नही निकला तो पुलिस को सूचना देकर बुलाया गया। पुलिस सभी नौकरो को पूछताछ के लिए थाने ले गई। उन्हे सबसे ज्यादा शक मानिक पर ही था क्योंकि वही सारे घर में बेरोकटोक आ जा सकता था। पुलिस ने बगैर पूछताछ के अपने अंदाज मे उसकी पिटाई चालू कर दी। वह पीड़ा से चीखता चिल्लाता रहा परंतु उसकी सुनने वाला कोई नही था। इसी दौरान अचानक ही बिस्तर के कोने में दबी हुई चूड़ियाँ दिख गई, उनके प्राप्त होते ही पुलिस को सूचना देकर सभी को वापिस घर बुला लिया गया।
मानिक मन में संताप लिये हुए, आँखों में आँसू, चेहरे पर मलिनता के साथ दुखी मन से घर पहुँचा और तुरंत ही अपना सामान लेकर नौकरी छोडने की इच्छा व्यक्त करते हुए सबकी ओर देखकर यह कहता हुआ कि उसके साथ आप लोगो ने अच्छा व्यवहार नही किया, उसके मान सम्मान को ठेस पहुँचाकर एक गरीब को बेवजह लज्जित किया है। मुझे लग रहा था कि मानिक की आँखें मुझसे पूछ रही हों कि क्या गरीब की इज्जत नही होती ? क्या उसे सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार नही है ? उसकी सच बातों को भी झूठा समझकर उसे क्यों अपमानित किया गया ? यह जानकर परिवार के सभी सदस्यों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए उसे नौकरी नही छोडने का निवेदन किया। वह यह देखकर कि उसके मालिक के द्वारा स्वयं माफी माँगी जा रही है। वह हतप्रभ एवं द्रवित होकर नौकरी छोडने का विचार छोड देता है।