गर्मी
गर्मी इतनी बढ़ गई, निकले सब का दम,
धरती इतनी जल रही, कैसे होगा श्रम।
गुट-गुट पानी पीने पर भी, बूझती नहीं है प्यास,
गर्मी के कारण बगीया में, उगती नहीं हैं घास।
कटते वृक्ष को देख कर,दिनकर कर रहे क्रोध,
प्रतिदिन गर्मी बढा कर, दिखा रहे आक्रोश।
सूर्य देव हैरान हैं, बदले मानव क्या रंग,
सर्दी में खुब सुहाता, गर्मी रहे क्यू दंग।
Uma vaishnav
मौलिक और स्वरचित