दुनिया सदा चली है अग्रिम विरासतों से
अब लुट रही जवानी बूढ़ी शरारतों से
मदहोशियों में डूबी बेजार है जवानी
अब क्या सुनाऊँ बूढ़े संसार की कहानी
अंतिम समय से पहले सत्ता न छोड़ती है
भौतिक क्षुधा पिपासा तारे ही तोड़ती है
अब वानप्रस्थ केवल स्वप्नों की व्यर्थ बातें
पर्दे के पार्श्व से हैं आखेटकों की घातें
अक्षुण्ण बन गयी है दसशीश की जवानी
अब क्या सुनाऊँ बूढ़े संसार की कहानी
जो मुक्त पथ के राही महफिल सजा रहे हैं
सावन बुझे दिये से जन्नत दिखा रहे हैं
तरुणाइयाँ सुरा के ठुमके लगा रही हैं
सारी विरासतें मिल ढपली बजा रही हैं
छल स्वार्थ दे रहे हैं बच्चों को पथ निशानी
अब क्या सुनाऊँ बूढ़े संसार की कहानी
भौतिक प्रबन्ध में ही खप जाते जन्म दाता
शृंगार खींच लेता होती अनाथ माता
जैसी मिली व्यवस्था पथ वरण कर रही है
जो शीर्ष पर जमे हैं अनुसरण कर रही है
नैतिक चरित्र धूमिल अलमस्त है जवानी
अब क्या सुनाऊँ बूढ़े संसार की कहानी
Kuber Mishra