आओ मिलकर दीप जलाएँ ।
खुशियों के संगीत सुनाएँ ।
विश्व पटल पर अपने भी ।
होने की अनुभूति कराएँ ।
मन भी चुप है तन भी चुप है ।
शब्दांकित है आँखो में ।
उड़ने को प्रेरित जो करते ।
जूझ रहे संत्रासों से ।
आओ हम ही कुछ सोचे ।
बगिया मे कुछ फूल खिलाएँ।
हृदय से उनके हित कुछ सोंचे।
यदि समाज से आते हैं।
है अनुराग शेष यदि थोड़ा।
फिर काहे शरमाते हैं।
वह हमको समझें न समझें ।
हम मिलउनको ही समझाएँ।