# काव्योत्सव 2.0
तिरंगा
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
लहूसंग संग और तीन रंगो में रंगा मैं
क्या शान मेरी
चार कंधो की सवारी मेरी
क्या इतना था चंगा मैं?
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
सीमा पर जब छेड़ी जंग दुश्मनों नें
जल रही थी अपनी भुमी
जलते हुऐ अंगारों में
दटे रहे सीमा पर फिर भी
जबतक थी जान अपने जान मैं
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
वो बौछार गोलियों की झेलके अपने सीने में
फिर लहरा दिया तिरंगा प्यारा
दुश्मनों के सीमा में
फिर गुंजा 'जय हिंद 'का नारा
भारत माँ कि शान में
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
अब चाहे सुला दो मुझको
धरती माँ कि गोद में
मत रोया कर मेरी माँ
अब मेरे मातम मैं
कर दो बिदा मुझको
क्योंकी आना है वापस
इसी भारत भुमि में
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
कतरा कतरा बहा है अपना
इस जन्मभूमि के बलिदान में
ना रही कसर कोई
वचन अपना निभाने में
देख माँ आया मैं लिपटा हुआ तिरंगा में
विनंती म्हात्रे खारपाटील.