संस्कृति व साहित्य का........
संस्कृति व साहित्य का, बड़ा अनोखा मेल।
मानव और समाज का, देश प्रेम का खेल।।
साहित्य सदा समाज का, दर्पण होता खास।
संस्कृति को लिपिबद्ध कर, गढ़ देता इतिहास।।
संस्कृति मानव आचरण, रहन सहन व्यवहार।
भविष्य आकलन के लिये, शोधपूर्ण संसार।।
चरित्रवान संस्कृति सदा, करे राष्ट्र निर्माण।
सभी प्रगतिपथ पर चलें, जग करता सम्मान।।
मानवता की दृष्टि में, कहलाते वे ज्येष्ठ।
जिसमें सबका हित निहित, वही कार्य हैं श्रेष्ठ।।
कुसंस्कारों में फँसा, विघटित हुआ समाज ।
अपयश ही मिलता उन्हें, विफल रहें सब काज।।
संस्कारों से संस्कृति, होती है धनवान।
उसके बिन तो शून्य है, पढ़ा लिखा इंसान।।
संस्कृति औ साहित्य का, नाता बड़ा अनन्त।
चिरजीवी चिरकाल तक, कभी न होता अन्त।।
मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "