।।कब तक खामोश रहेगी नारियाँ ।। #काव्योत्सव -2
#प्रेरणादायक
किसी भी बात पर,
किसी भी घात पर
कब तक खामोश रहेंगे नारियां ?
हर फैसले में धकेल दी जाती हैं
निज अस्तित्व के लिए भी ,
आवाज दबा दी जाती है ,
खुद के लिए भी लिए,
फैसले पीछे छोड़ आती हैं ।
निजता के लिए भी
कहां जी पाती है नारियां ?
कब तक खामोश रहे ?
जुल्म सब सहे वो
कुछ भी कहने को
वह अपना हमदर्द समझ
भाव जिसे दे रही थी ,
उसी अपने से शोषित हो रही नारियां ।
उठा दी जो एक भी उंगली
उस पर ही सैकड़ों
उठाते हैं उगुँलियां ।
तार-तार वो करे ,
रिश्तो पर वार करें
उधडें रिश्तो को सिल रही है नारियां ।
अपने लिए भी क्या,
कुछ कह पाती हैं ?
अपने ही दर्द को ,
क्या बयां कर पाती हैं ?
आहत हुए अंतर्मन को
आंसुओं के भाव से,
शब्दों के मरहम से सहला रही नारियां ।
आसमां छूने की चाह लिए
उड़ चली थी पंतग
काट दी गई डोर
कांटो के दंश झेल रही नारियाँ ।
सदियां बीत गई ,
दर्द को जीते हुए,
अपने ही स्वाभिमान का गला घोटते हुए,
अपने ही रक्त के एक -एक कतरे का ,
क्या हिसाब लिख पाएंगी नारियां ?
खुद के लिए ,
हर सच - झूठ का
खुद से ही न्याय कर करने के लिए,
इतिहास बदल पाएगी नारियाँ ।
तभी तो वह सम्मान
खुद का बचा पाएगी नारियाँ ।।
नमिता '"प्रकाश"