#काव्योत्सव के लिए
प्रेरणादायक कविता
काल्पनिक सृजन
बीस साल बाद भारत
यह करिश्मा होते मैने देखा है।
टूटते तारों से मांगी मुराद को
पूरे होते देखा है।
अधखुली आंखों से स्वप्न मैंने देखा है।
देश को उन्नति के ......
सिरमौर मैंने देखा है।
शीश इसके सामने.......
विश्व को झुकाते देखा है।
एकता की ताकत का
वर्चस्व मैंने देखा है।
अधखुली आंखों......
समाज में बसी सड़ी-गली रूढ़िवादियों को
टूटते मैने देखा है।
एक नए आधुनिक भारत का
आगाज होते देखा है।
अधखुली आंखों.....
हिंदू मुस्लिम का
एक दूजे से गहरा नाता है ।
सिख इसाई में भी
भाई भाई का तराना है।
नहीं कोई इनमें बैर पुराना है।
ईश्वर अल्लाह और नानक को
आपस में रूप बदलते देखा है।
अमन के फूलों को
दिलों में खिलते देखा है
अधखुली आंखों....
बेटी के जन्म पर
निहाल पिता को होते देखा है
बेटा बेटी में नहीं कोई
भेदभाव पनपते देखा है
आंगन में बेटी को चहकते देखा है।
अधखुली आंखों......
नारी को भी आजादी की
ओर कदम बढ़ा खुली हवा में
उड़ते देखा है।
कंधा पुरुषों के संग मिलाकर
देश हित में अपना
कर्तव्य निभाते देखा है ।
अपनी नारी शक्ति का
परचम लहराते देखा है।
अधखुली आंखों......
एक नये भारत का स्वर्णिम
कल मैने देखा है।
*अर्चना राय भेड़ाघाट जबलपुर मध्य प्रदेश*