# काव्योत्सव २.०
विषय: प्रेम
शीर्षक: …… सहारा हो!
…… सहारा हो!
मेरे जीने का अब तुम....
बस एक सहारा हो
मझधार में अटका हूँ
अब तुम ही किनारा हो....
तेरे प्यार की गर मुझको
एक बूंद भी मिल जाए...
दीदार की बस छोटी
एक पल भी मिल जाए....
बस और जीने का कया..उद्देश हमारा हो।
मेरे जीने का अब तुम.... बस एक सहारा हो
सोते जगते मुझ को
अब तू ही नज़र आए
मेरे बस में नहीं अब मैं
सबकुछ हैं तुझ साये
मुझे ख़्वाब अगर आए...दर्शन तुम्हारा हो।
मेरे जीने का अब तुम.... बस एक सहारा हो.....
मेरे दिल में छिपा है जो
गर तू उसे पढ़ पाए
मेरे प्यार की हल्की सी
गर भनक भी लग जाए
परवाह ना फिर कोई...मुझे मौत गवारा हो।
मेरे जीने का अब तुम... बस एक सहारा हो….
© देवांशु पटेल