#काव्योत्सव
#प्रेम
दुनियां की आंखों से बचाकर
पलकों में अपनी छुपाकर
नजरों में उतारकर रखा है
मैंने एक ख्वाब संभालकर रखा है
डरती हूं पलके खुलते ही टूट न जाये
इन कांपते हाथों से कहीं छूट न जाये
पर बिन ख्वाबो के भी तो
ज़िंदगी ये वीरान होगी
तकदीर भी कहाँ मेरी
तब मुझपर मेहरबान होगी
जीने के लिए मैंने बस
यही ख्यालकर रखा है
मैंने एक ख्वाब संभालकर रखा है
चंद ख्वाब पिरोने चाहे ग़ज़लों में
कुछ को कविता बनाना चाहा
पर अधूरी नज़्में बन
रह गए वो सिमटकर
कुछ ऐसे ही ख्यालों से मैंने
ज़िंदगी को बहालकर रखा है
मैंने एक ख्वाब संभालकर रखा है
जब खामोशियों से होती हूं रूबरू
जब तन्हाई होती है हर सू
जब सजदे में झुकने लगती हैं पलकें
अरमां आंखों से गुहर बन छलकें
चंद ऐसे पलों को अपनी
रूह में संवारकर रखा है
मैंने एक ख्वाब संभालकर रखा है।
प्रिया