kavyotshav 2 स्वरचित
हम बेगाने हो गए
जहाँ थे गुलिस्तां वहां
अब वीराने हो गए।
अपनों के ही बीच में
हम बेगाने हो गए।।
यहाँ भाई भाई को
नहीं जानता है।
कोई किसी को नहीं
पहचानता है।।
लहू सर्द और रिश्ते
अनजाने हो गए।
हम बेगाने हो गए...हम...।
स्वार्थ की आंधी में इंसान
अँधा हो गया ।
इंसानियत मर ही गई
पत्थर कलेजा हो गया।।
किसको कहें अपना यहाँ
सब बेगाने हो गए।
हम बेगाने हो गए...हम...।
घर घर में रौशनी है पर
दिलों में अँधेरा है।
प्यार की किरण यहां
ढूंढती सवेरा है।।
विदेशी चमक के हम सब
दीवाने हो गए।
अपनों के ही बीच में
हम तो बेगाने हो गए।
हम तो बेगाने हो गए......।।
जमीला खातून
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