Hindi Quote in Poem by Priya Vachhani

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#काव्योत्सव
#प्रेम

यादों के मंडराते बादलों से
इस नीम अंधेरी रात में
निकलकर आया एक ख़्वाब
तराशने इन भारी पलकों को ...
इन पनीली पलकों के सिवा
अब मेरे पास ...
कुछ भी तो नहीं मेरा अपना
न नींद ,... न धड़कनें ...
भरा है बस उम्मीदों का कूड़ा
जिसके बोझ से बरसता है सावन
बह जाते हैं जिसमें खिलने का
अरमान रखने वाले फूल
हलकी सी अंधेरी हवा से
बुझ जाती है सूरज की लौ भी
समा जाता है चाँद सागर में
त्याग सितारों का आँचल
हां ...हो सकता है ...
कभी यूँ भी हो सकता है ...
जब बेमानी हो जाएं सारे रिश्ते
भुला दूँ जब खुद को भी
तब एक रात नवाज़ा जाए
गहरी नींद से ...
तब शायद सजा पाऊंगी
इन उन्नींदी पलकों पर
इस ख्वाब को.....
प्रिया

Hindi Poem by Priya Vachhani : 111161511
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