#काव्योत्सव #गीत
मैं हूँ तेरे लिए, तुम हो मेरे लिए,
प्रेम का तेल भरकर जलाए दीए,
तुझपे वारी हूँ मैं, ये दिल हारी हूँ मैं,
जिंदगी भर समर्पण तुम्हारे लिए।।
प्रेम की वेदना कह रही सुन सजन,
मिट ही जायेगा तम,जब ये होगा मिलन,
चैन महलों का छोड़ा नहीं कुछ लिया,
सब किया मैंने तर्पण, तुम्हारे लिए,
जिंदगी भर समर्पण तुम्हारे लिए।।
प्रेम की हूँ लता छू लूँ चित को तेरे,
है यही कामना बन जा मीत तू मेरे,
ना नयन में कोई, ना सपन में कोई,
घर में है एक दर्पण तुम्हारे लिए,
जिंदगी भर समर्पण तुम्हारे लिए।।
तेरी यादों का मुझको बिछौना मिला,
ये ना पूछो कि राहों में कौन ना मिला,
बस तुम्हारे लिए ही सँवरती रही,
मैं बिखर जाऊं कण कण तुम्हारे लिए,
जिंदगी भर समर्पण तुम्हारे लिए।।
-राकेश सागर