#रात के जज्बात
कविता - काली अँधेरी रात
काली अंधेरी रात आ गयी ,
घनघोर घटा फिर से छा गयी ।
दर्द के तकिये तले ,
तन्हाई फिर से आ गयी ।
यादो की बारात संग,
उजडे सपनो के रंग दिखा गयी ।
मन की हसरतें तमाम,
दिल के टुकड़े बिखरा गयी ।
अन्दर बाहर दोनो जगह,
अमावस्या जैसे आ गयी ।
ह्रदय बेदना चीखे बहुत पर ,
लव पर खामोशी छा गयी ।
एक अपना क्या हुआ पराया,
अर्थी जैसे मेरी निकल गयी ।
दर्द पराया लागे ना अबतो ,
खुशीया जब से रूट गयी।
जाने कितनी बाते मेरी ,
मुझको ही सुना गयी ।
देखे थे जो सपने कभी,
उन सपनो की झलक दिखा गयी
काली अंधेरी रात भी देखो,
कैसा गजब ये ढा गयी ।
अपने पराये सब से मिला यादो में पर,
सारी मुलाकते यादे अंधेरे में छिपा गयी।
हुई खबर ना कानो कन
कुछ बाते ऐसे भी अपनो से हो गयी।
काली अँधेरी रात में यारो
देखो यादो की बारात सी चल गयी ।
है फिकर रोसनी की किसको
अँधेरों से यारी हो गयी
काली अँधेरी रात मे देखो
मुझको मेरी बिछडी सारी यादे मिल गयी।
है अनोखी ये रात सुहानी
जाने कैसे ये अँधेरों मे घिर गयी।
✍ RJ Krishna ✍