ग़ज़ल
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हाँ, सियासत सिर्फ़ सत्ता का समर है, सच समझिए ।
तल्खियों के दौर में मुश्किल डगर है, सच समझिए।
नीम जैसी चीज़ कुछ क्या जीभ पर रख ली सभी ने,
हर ज़ुबाँ पर दोस्तों कड़वा ज़हर है, सच समझिए।
रंजिशों को पालकर रक्खे रहे बरसों-बरस जो,
साथ ही अब कट रहा उनका सफ़र है, सच समझिए।
ढेर वादों के यहाँ खुलकर लगाए हैं सभी ने,
आपके ही वोट पर सबकी नज़र है, सच समझिए।
झूठ भी दीदादिलेरी से परोसे जा रहे हैं,
कौन जाने झूठ का कितना असर है, सच समझिए।
--बृज राज किशोर 'राहगीर'
ईशा अपार्टमेंट, रुड़की रोड, मेरठ-२५०००१ (उ.प्र.)