Hindi Quote in Poem by Shaihla Ansari

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यकीं के काबिल नही है ये इंसा
मफ़्हूम(मतलबी)सा ही हो गया है इंसा
अब तो साए पर भी एतमाद ना रहा
हयात-ए-अंज़ुमन(ज़िंदगी की महफिल)में खो सा गया है इंसा!!

अपने ज़मीर को मुर्दा करके
ज़िंदा लाश ही तो बन गया है इंसा
अब ये दुनिया भी रहने के लायक़ नही है
खुशियों का ताज़ीर(व्यापारी)बन गया है इंसा!!

हम कयास(उम्मीद)लगा बैठे थे इंसा से
कि दिल की शाख को सब्ज़(हरा)करेगा
वो भी अपने प्यार की लज़्ज़त(आनंद)से
पर बेरुखी का नक्श(छाप)छोड़ गया है इंसा!!

जिसके लिए हम मर-मर कर जीते हैं
दिन रात आंसू हंस कर पीते हैं
आज वो भी मुखालिफ(विरोधी)हो गए हैं मेरे
हमें अच्छा दर्स(सबक)दे गया है इंसा!!

आफताब भी डूबता है शाम को अंधेरे में
फिर तू क्या शयं(चीज़)है नादां इंसा
बड़ा तक़ब्बुर(घमंड)है तुझे अपने आप पर
ना भूल तेरा जीस्म तो फानी(नश्वर)है इंसा!!

Hindi Poem by Shaihla Ansari : 111157517
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