Hindi Quote in Poem by Dileep Kushwaha

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#kavyotsav_2
#घर की ओर#

मैं सफर को हमसफर बना कर चला
शहर को छोड़ गांव को मैं चला
ट्रैन से यात्रा थी विंडो सीट मिली
मैं दुनिया का अवलोकन करते चला
बड़े -बड़े मंजिल छोटे होने लगे
जैसे हम फिर प्रकृति में खोने लगे
बड़े छोटे सभी बृक्षो से मिले
उन खेती करते किशानो से मिले
थी कड़ी धूप फिर भी थे कर्मरत
हमने चाहा जताना प्रेम बरबरत
ट्रैन की छुक -छुक में हम बढ़ थे चुके
लेकिन उनकी कहानी गढ़ थे चुके।
बात छिड़ी अब जाके राजनीति पर
योगी ,मोदी अखिलेश मायावती पर
सुन रहा था चुप होकर मैं सारी बात
आया गोरखपुर ट्रेन स्टेशन जा लगी
दिल की धड़कन मेरी तेज होने लगी
मिलूंगा मैं शीघ्र ही अब सभी से
मम्मी-पापा और गावँ के दोस्तों से
खेलूंगा खेल वह छोड़कर जो गया था
सफर को हमसफ़र बनाकर मै चला था।।

Hindi Poem by Dileep Kushwaha : 111157092
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