मुझे,तेरी आदत हो गयी है,
सुबह - शाम आने की वजह मिल गयी है,
सीढ़ियां चढ़ने का बहाना मिल गया है,
सोयी धुनों को जगाने का अवसर मिल गया है।
हिमालय तक जाने का मौका मिल गया है,
यादों में टहलने का अवसर दिख रहा है,
चलते-चलते, तुम्हारी आदत हो गयी है।
गंगा में नहाने का उत्सव मिल गया है,
भारत की गूँजों से सामना हो गया है,
मुझे, तेरे गीतों की आदत हो गयी है।
अनादि प्यार की आवाज मिल गयी है,
आते-जाते, संस्कृति की राह मिल गयी है,
मुझे,प्यार की आदत हो गयी है,
आँखों में रहने की वजह मिल गयी है।
*महेश