वक्त के साथ
कभी बैठ कर देखो
नजारा अपने अंदर का
तो पता चलता है
हकीकत क्या है
देखने में लगता हूं
मैं भी सीधा साधा
अंदर तेरे जो भूचाल है
वह तो सिर्फ वक्त ही जानता है
सोचने को सोच सकता है
कुछ भी पर हकीकत आते आते
सब फसाने बन जाते हैं
वक्त की गहराई को सोचो
मेरे मित्रों
वक्त के खेल को समझो
मेरे मित्रों
अपूर्व तिवारी 'रघुवंश'