ये आखरी पत्ता फेंक ही देते
दाव पे कुछभी तुम्हारा नहीं
क्युं मुश्ताक हुकम के इक्के पे?
जितके सुकु भी तुम्हारा नहीं
ये बाजीगरी तुम दीखाते हो जो
लाशमें बंदमुट्ठी भी तुम्हारी नहीं
छाये मेहफिलोमें,सब दाद देते
बोले जो वो नाम भी तुम्हारा नहीं ।।
---देवांग दवे ©