"कलम"
हर दिल की तन्हाई से वाकिफ़ हूं मैं
सबके जज़्बात से वाकिफ़ हूं मैं,
जब-जब मुझे किसी ने थामा हैं
अपने दिल का हाल पहले मुझे सुनाया है,
हर अल्फाज़ जब पन्नों पर उतरते हैं
मुझसे ही तो होकर ये दर्द गुज़रते हैं,
मुझसे ज़्यादा ग़मगी़न दुनिया में कौन होगा
कि खुशी और ग़म दोनों को चखा है मैंनें,
आँखों की तरह मैं भी रोता हूं
जब अपनी स्याही से पन्नों को भिगोता हूं,
मेरा सहारा भी खुदा की नेअमत हैं
हर दर्द-ए-दिल की दवा जो हूं मैं,