कुछ लम्बी बातें कर लें
उन पेड़ों के बारे में
जो जंगल से लुप्त हो रहे हैं,
उन पहाड़ों के बारे में
जो कट कट कर गिर रहे हैं,
उस सागर के बारे में
जो जमीन को निगल रहा है,
उन रिश्तों के बारे में
जो कर्कश हो चुके हैं,
उन राहों के बारे में
जहाँ हम साथ-साथ चले थे,
उन गांवों के विषय में
जो बचपन में आये थे,
उन शहरों के बारे में
जो विचित्र हँसी हँसते थे,
उन कटु अनुभूतियों के बारे में
जो बेरोजगारी से बिखरे थे,
उस महाभारत के बारे में
जिसके पात्र हम भी थे,
उस नदी के बारे में
जो देखते देखते मैली हो गयी थी,
उस कहानी के बारे में
जिसे हम बार बार दोहराते थे।
उस प्यार के बारे में
जो जमा, बहा,उबला और वाष्पित हो गया था।
*महेश रौतेला