नहीं चाहिए आसमान की बुलंदी
नहीं करनी पुरुषों की बराबरी
नहीं बनना ख्वाबों की रानी
नहीं कहलाना घर की हूँ मालकिनी
मैं औरत हूँ मुझे औरत ही रहने दो
मेरा आत्मसम्मान मेरे पास रहने दो
मजबूत हूँ या कमजोर हूँ फर्क नहीं पड़ता
बस शरीर नहीं हम यह समझने दो।
चेतना है आत्मा है इच्छा भी है
कुछ अलग करने की मंशा भी है
पहचान की अपनी लड़ाई लड़ते रहे
पुरुषों की दुनिया में खुद को बचाने की चिंता भी है
पुरुषों की कहाँ
ये दुनिया हमारी भी आधी थी
पुरुषों की तरह
हम भी आधी आबादी थीं
जाने कब कैसे क्या हो गया
हम बस एक शरीर बन गयीं
पुरुषों की जागीर बन गयीं
फ्रीडम फेमिनिस्ट का राग अलापती
खुद स्वतंत्र स्वच्छंद बताती
कह दो क्या सत्य है
क्या नारी सच में स्वतंत्र है???