ओ शाम कभी तो खुला करो
मन के लिए,मनुष्य के लिए,
प्यार को पास ला
कभी तो गुनगुनाओ।
धरती की पूरी परिक्रमा कर
कभी तो मिठास दे दो,
जलती हुई रोशनियों में
क्षणभर घुलमिल लो।
ओ शाम एक आलिंगन में
सम्पूर्ण प्यार लपेट दो,
पूरे दिन की बातों को
गहरा रंग दे,सुला दो।
**महेश रौतेला