अमृता इमरोज़ से अक्सर कहती कि 'देख इमरोज़ तेरी तो जीने बसने की उम्र है जाओ तुम अपनी ज़िन्दगी जीओ.मैंने तो अब वैसे भी बहुत दिन नहीं जीना है."..और इमरोज़ कहते कि मैंने क्या तेरे बगैर जी कर मरना है..? शायद तभी अमृता जा कर भी उनकी ज़िन्दगी से अब तक दूर नहीं हो पायी है.प्यार के रिश्ते बने बनाए नहीं मिलते जैसे माहिर बुत तराश को पहली नजर में ही अनगढ़ पत्थर में से संभावना दिख जाती है मास्टर पीसकी मास्टर पीस बनाने के लिए बाकी रह जाता है सिर्फ..तराश --तराश ---तराश उसी तरह दो इंसानों को भी पहली नजर में एक दूसरे में संभावना दिख जाती है -प्यार की जीने योग्य रिश्ते की बाकी रह जाती है तराश -तराश -तराश --सोते जागते हुए भी बोलते बुनते हुए भी...खामोशी में भी और एक दूसरे को देखते हुए भी और न देखते हुए भी और न देखते हुए भी यह ज़िन्दगी का रिश्ता दिलकश रिश्ता एक रहस्यमय रिश्ता न यह रिश्ता ख़त्म होता है और न ही इसकी.. तराश -तराश -तराश..
मातृभारती पर इस कहानी 'आधी नज्म का पूरा गीत - 14' पढ़ें
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